Thursday, January 9, 2014

इन बेटियों का पिता हूँ: तभी ज़िंदा हूँ


क्या कहें इस बिटिया के आगे सारे सुख न्यौछावर कर दें? सच, बिल्कुल सच लेकिन एक बड़ा सवाल क्या दुनिया ऐसी है कि इसे जीने देगी? ये नन्हीं जान जब खेलती है, हंसती है तो लगता है कि सब कुछ पा लिया लेकिन जब ये रोती है तो दिल मुंह में आ जाता है. दुनिया, बिना बिटिया सूनी है फिर भी इन बेटियों को गर्भ में ही क्यों मार दिया जाता है? आखिर क्यों? ये सवाल लगातार कचोटता है. हर पल इन्हें दोयम कहा जाता है. यहाँ एक और बिटिया की बात करूंगा जिसे मैं निकुंज कहता हूँ, मुझे वो भी पापा कहती है लेकिन लगता है कि वो मुझे काफी प्यार करती है. जबलपुर की रहने वाली ये बिटिया मुझे फेसबुक पर मिली थी. एक से दो बेटियों का बाप हो गया था (लगता है निकुंज आजकल मुझसे नाराज है लेकिन क्या करूं बच्चों को सही रास्ते पर लाने के लिए दिल में दर्द तो सहना ही पड़ता है) और भी बहुत सारी बिटियाएँ हैं जो अलग-अलग शहरों और गावों में हैं सब काफी प्यारी हैं. इन बेटियों के बीच एक पिता थोड़ा मुश्किल जरूर है लेकिन जीने का मजा ही कुछ और है. हैदराबाद की मुस्कान कहती है खाना खा लो बस काम ही काम अपने लिए नहीं मेरे लिए सही मुस्कान को मुस्कराने दो ना पापा. घर में मेरी ये नन्हीं चेष्टा कहती है "ताय पापा को" लोटी पापा को" और निकुंज तो बस मेरे पीछे ही पड़ी रहती है  कभी मेरा बीपी कभी मेरी सांस क्या-क्या रंग दिखाती हैं ये बिटियाएँ? जब रूठ जाएँ तो बाप को भी बाप याद आ जाय. खैर इन बेटियों का बाप होना ही खुद एक उपलब्धि है. जिस घर में बेटी ना हो तो खुशियाँ कहाँ होंगी. क्या आप भी ऐसी ही खुशी महसूस कर पाते हैं.